अश्कनामा

‘अश्कनामा’ १९९७ में मेरी लेखनी से निसृत हुआ| जिसकी एक-एक पंक्ति मैंने अपने एक-एक आँसुओं से लिखी है| जिसमे एक लम्बी कविता ‘अश्कनामा’ के साथ मेरे ८२ मुक्तक भी संकलित हैं, जो ‘अनुसंधान प्रकाशन’ द्वारा २००८ प्रकाशित की  गई|

अभिमत

‘अश्कनामा’ ज्यों-ज्यों पढ़ता गया। आपके आँसुओं में भीगता गया।
– गोपालदास ‘नीरज’

‘अश्कनामा’ में सधे हुए बन्द में रूमानी भाव-प्रवाह देखते बनता है।
– रामदरश मिश्र

‘अश्कनामा’ में आपने उपालम्भ काव्य-धारा को आँसुओं में घोलकर विरही मन की अन्तर्कथा को आत्मकथा ही बना दिया है।
– किशोर काबरा

‘अश्कनामा’ में आपने आँसू निकलने के कारणों को बड़े ही दर्द के साथ उकेरा है।
– विष्णु सक्सेना

‘अश्कनामा’ के मुक्तकों में चिन्तन के शिलालेख पर प्रीत की अक्षरावली बिखरी है।
– बालेन्दु शेखर तिवारी

भूमिका

‘अश्कनामा’चित्त का सौम्य द्रविण
भूमिकाकार – डॉ. सूर्यप्रसाद शुक्ल

श्री चेतन दुबे अनिल ने अपने मुक्तकों, रुबाइयों के संग्रह ‘अश्कनामा’ में सुन्दर, भावपूर्ण, कलात्मक कविता – धारा प्रवाहित की है, जो प्रीति की रीति का आत्म प्रस्रवण है। जिसमें कवि का मन – प्राण रचा – बसा है। इन मुक्तक – मणियों में मन का ओज शब्दों में व्यक्त होकर भावमयी रचनाओं का कारक बना है। इनमें मन और कवि के संस्कारों की रस प्रतीति जीवन और उसके रहस्य से भी संप्रक्त लगती है।

‘अश्कनामा’ से स्पष्ट होता है कि कवि के जीवन को उसके विरही मन ने अनेक दंश दिए हैं। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती काव्य ‘सुधियों के दंश’ में भी इन्हीं भावों का इजहार किया था। किन्तु इन रुबाइयों में वही विरही तत्व विप्रलम्भ का कुछ अधिक प्रौढ़त्व लेकर अवतीर्ण हुआ लगता है।

‘अश्कनामा’ में कवि ने वेदना की गहरी अनुभूति को सम्बोधित करते हुए अन्तर की आकुल आस में, पीड़ा से प्लावित दर्दों  के पतझर को, अपने मन के मधुमास से, आँसू के सागर में डूबे अनुराग से तिरोहित हो जाने की ख़्वाहिश जाहिर की है। जीवन की क्षणभंगुरता को, चटक चाँदनी की नि:सारता को, सौंन्दर्य – धन – वैभव के क्षण मात्र में नष्ट हो जाने वाली सत्यता को ‘अश्कनामा’ में सूफियाना रंग दिया गया है। कृति में इश्क़ हकीकी  और इश्क़ मजाजी तथा सांसारिक और अलौकिक प्रेम की अनुभूति भी रची – बसी दिखाई देती है।

कृति में शब्द-सौष्ठव, शब्द-मैत्री और शब्द का दर्द भरा एहसास दर्द के दीपक की लौ में, इश्क़ से हुस्न के मिलन में, राग के फाग में, अश्क के समन्दर में देखा जा सकता है। इन मुक्तकों – रुबाइयों में दीवानी मीरा और कबिरा की बानी को दर्द की राजधानी में अनन्त दीवानगी के साथ देखा एवं महसूस किया जा सकता है। कवि ने ‘अश्कनामा’ में प्रत्यक्ष जीवन के साथ अपने प्रेम के रस से आप्लावित-मानस का प्रश्रवण किया है जो विषयानन्द और आत्मानन्द समन्वित लौकिक और अलौकिक आनन्द के कवित्व का सौन्दर्यपरक शब्दानुवर्तन है और चित्त का सौम्य द्रविण भी है।

सम्पर्क – 119/501, सी- 3, दर्शनपुरवा, कानपुर –
208012

अश्कनामा – एक लम्बी कविता

मेरे कवि की लेखनी उठो
कवि – कुल का उज्ज्वल नाम करो,
मधुरस में चोंच डुबोकर,  माँ
वाणी को प्रथम प्रणाम करो।

मेरे कवि की लेखनी जगो
नूतन रचना – निर्माण करो ,
सपनों के साज मिलाने को
चलने का नया विधान करो।

वेदने! जगो, आगे बढ़कर
कवि की कविता की जय बोलो,
किसलिए भयातुर होती हो
अन्तर्मन के फाटक खोलो।

मेरे कवि की कल्पने! तुम्हें
नूतन रचना रचवाना है,
इसलिए विगत की सुधियों को
फिर वर्तमान में लाना है।

साधने!  शिथिल क्यों होती हो
सुधि के सागर को पार करो ,
जो कुछ कहना है कह डालो
इस पार करो,  उस पार करो।

विधि ने जो लिखा, उसे भोगो
वेदने!  विकल क्यों होती हो,
जीवन है समर, बढ़ो आगे
कल्पने! किसलिए रोती हो।

मेरे मानस के मान जगो
ऐ तानसेन की तान जगो,
दुनिया में झूठी शान जगी
उर के आकुल अरमान जगो।

अन्तर की आकुल आस जगो
पीड़ा से प्लावित प्यास जगो,
दर्दों के पर्वत हटो दूर
मेरे मन के मधुमास जगो।

बैजू के दीपक-राग जगो
आकुल अन्तर की आग जगो,
आँसू के सागर में डूबे
मेरे उर के अनुराग जगो।

उर्वशी ! किसलिए रूठ गईं
किसलिए मान कर बैठी हो
क्यों कैकेई – सा कोप किए
क्या हृदय ठानकर बैठी हो?

मेरी मेनके!  कहो तो कुछ
उर्मिले!  उमे! कुछ तो बोलो ,!.
दुनिया दो दिन का मेला है
रस में मत इतना विष घोलो।

रुपसि! क्षण-भंगुर जीवन है
बेमतलब मत यों मान करो
यौवन है सिर्फ चार दिन का
यौवन  पर यों न गुमान करो

यह चटक चाँदनी दो दिन की
सब यहीं रखा रह जाएगा,
सौंदर्य – समुंदर  ,धन – वैभव
पल भर में ही बह जाएगा।

मानिनी!  मान इतना न करो
मान लो तनिक मेरा कहना,
यह रूपराशि दो दिन की है
गल जाएगा तन का गहना।

चिन्तन के शिलालेख पर लिख
अन्तर में तुझे निवास दिया ,
तूने सपनों का किया ख़ून
मेरे मन को वनवास दिया।

तेरे दर्शन की साध लिए
यों कब तक तुझे पुकारूँ मैं
उर्मिले! कृपा की कोर करो
कब तक निज तन-मन वारूँ मैं

आईं सम्बन्ध निभाने को
किसलिए छोड़कर चली गईं
दो दिन सम्बन्ध निभाकर के
अनुबंध तोड़कर चली गईं।

जीवन लगता वीरान मुझे
तेरे बिन जग में सार कहाँ
यदि सार नहीं है सपनों में
फिर प्यार कहाँ? फिर प्यार कहाँ

तेरे दिल का बुझ गया दिया
तू अब क्या प्रीत निभाएगी ,
दिल की जो बसी हुई दुनिया
क्योंकर वह तुझको भाएगी।

तुझको क्या कोई मरे जिए
तू सुखी रहे सुख सपनों में,
जीवन भर साथ निभा दे जो
ढूँढो गैरों में,  अपनों में।

उर में अरमानों को लेकर
किस देहरी पर मस्तक टेकूँ ,
तेरे बिन सारा जग सूना
किस ओर कहो किस विधि देखूँ?

तुझको सम्बन्ध निभाना हो
आजा,  फिर प्यार जगा दूँगा,
इस घृणा,  द्वेष औ नफ़रत की
दुनिया में आग लगा दूँगा।

मन के सपनों को सँग लेकर
किस द्वारे अलख जगाऊँ मैं
जो दिल था तुझको सौंप दिया
दूसरा कहाँ से लाऊँ मैं।

माना कि मिलेंगे बहुत तुझे
अपनी ‘उर्मिला’ बनाने को ,
विमले!  तू बलि – बलि जाएगी
अंतर की प्यास बुझाने को।

‘ढाई आखर’ क्या समझोगी
तुम क्या जानो सपना क्या है?
प्यार भी तुम्हारी नज़रों में
पागलपन है,  अपना क्या है?

रम्भे!  तुम रमी रहो उर में
मैं सब अपयश पी जाऊँगा,
चादर दागों से मैली कर
अपयश में भी जी जाऊँगा।

यदि प्यार न होता दुनिया में
तो काँटे ही काँटे होते,
किसलिए यहाँ पर जग हँसता
किसलिए यहाँ पर हम रोते।

यदि प्यार न होता दुनिया में
तो यह जग होता वीराना
यदि आँख न लड़ती आँखों से
होता न कोई फिर दीवाना

यदि प्यार न होता दुनिया में
जग में केवल पानी होता,
यदि प्रकृति प्यार करती न कहीं
तो जग का क्या मानी होता।

सपनों की कौन बुने चादर
यदि प्यार न हो इस दुनिया में,
यदि सपनों को टिकने भर का
आधार न हो इस दुनिया में।

है प्यार पपीहे का प्रिय में
है प्यार मीन का पानी में,
है प्यार रूठने मनने में
सपनों में,  आना – कानी में।

है दीपक और पतंगे में
कमलिनी – सरोवर में भी है,
है प्यार ज्वार औ भाटे में
चन्दा में,  सागर में भी है।

है प्यार,  इसी से दुनिया है
यदि प्यार न होता, क्या होता?
सपनों के जीने – मरने का
आधार न होता, क्या होता?

दीवाने अगर नहीं होते
‘दीवान’ कौन कैसे लिखता,
हम – आप न होते अगर कहीं
तो सारा जग सूना दिखता।

सपने साकार हुए होते
तो ‘रामायण’ कैसे रचती
कवि कालिदास की ‘शकुन्तला’
दर-दर मारी-मारी फिरती

वह शेक्सपीयर का ‘हैमलेट’
‘गीतांजलि’  कौन कहाँ रचता
‘कामायनी’ अथवा ‘पदमावत’
जैसा महाकाव्य कहाँ टिकता।

मधुरे! अद्भुद शृंगार करो
रूठो न हमारी हृदय -लते!
बोलो, बोलो, कुछ तो बोलो
क्यों दूर जा खड़ी हो कविते!

रूपसि! ऐसा शृंगार करो
लख दर्पण भी शरमा जाए,
सुमुखे!  फिर प्यार करो इतना
मन, तन में आग लगा जाए।

सब बीती बातें बिसराओ
कोकिले!  मृदुल स्वर में बोलो,
विधुवदने!  ऐसे मत रूठो
फिर प्रणय – सिन्धु के तट डोलो।

शशि मुख पर मत घूँघट डालो
मुख को अलकों से दूर करो,
निज हृदय -शिला के तले दबा
अरमानों को मत चूर करो।

अपने चंद्रानन पर अरुणे!
यों अलकें बिखराया न करो,
जो दिल में तुझे बसाए हो
उसको यों ठुकराया न करो।

उर – पीड़ा कब तक सहूँ शुभे!
दर्दों में कब तक दहूँ शुभे!
तेरे बिन सारा जग सूना –
एकाकी कब तक रहूँ शुभे!

अरमानों के अंबार लिए
मन में मर्माहत प्यार लिए,
किस जगह झुकाऊँ शीश कहो
दृग में आँसू की धार लिए।

रूपसी!  प्रणय का पाश कसो
निज अधरों से उच्चार करो,
आओ अरुणे! फिर आ जाओ
फिर प्यार करो,  फिर प्यार करो।

भावना भटकती है दर- दर
तेरी सुधि में मारी – मारी,
अश्कों के बदले में संगिनि!
अन्तर की प्यास बुझा जा री।

अंतर में यही कामना है
तू उर में आठो याम रहो,
जब तक तन में है साँस शुभे!
अधरों पर तेरा नाम रहे।

– चेतन दुबे ‘अनिल’

 

 

 

Advertisements

3 thoughts on “अश्कनामा

  1. “वियोगी होगा पहला कवी,आह से निकाला होगा गान ।
    आपका अश्कनामा पढ़ा ,कवी के अंतस में प्रेम की अद्भुत प्यास का आभास देखने मिला ।
    बहुत ही सारगर्भित और पठन एवं मनन योग्य है आपका “अश्कनामा”एक सुन्दर रचना के लिए बधाई कवी चेतन दुबे अनिल जी शुभकामनाये 👌👌

    Like

  2. अश्कनामा कवि की अति सुंदर मार्मिक रचना कृति है।

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s